गुलरिया घाट, वाराणसी

लेख - Yogi Deep

Last Updated on January 16, 2025 by Yogi Deep

वाराणसी के ऐतिहासिक घाटों में से एक गुलरिया घाट है, जो अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। 20वीं सदी की शुरुआत तक यह दांडी घाट का हिस्सा था, लेकिन 1821 में बनारस के प्रतिष्ठित व्यापारी लल्लूजी अग्रवाल और बाबू सागरमल के संयुक्त प्रयास से इसे अलग पहचान मिली। घाट का ऊपरी हिस्सा एक प्राचीन मंदिर और कुश्ती स्थल को समेटे हुए है, जो यहां की परंपरा और इतिहास को जीवंत बनाता है। इसके अलावा, द्वारका के शारदापीठ की एक शाखा भी यहां स्थित है, जहां गेरुआ वस्त्र धारण करने वाले दंडी तपस्वी साधना करते हैं। यह घाट न केवल आध्यात्मिकता का केंद्र है बल्कि काशी की अनूठी धरोहर को भी प्रतिबिंबित करता है।

गुलरिया घाट का इतिहास

गुलरिया घाट, जो कभी 20वीं सदी की शुरुआत तक दांडी घाट का हिस्सा था, वाराणसी की ऐतिहासिक धरोहर का एक अहम हिस्सा है। इसका निर्माण 1819 में बनारस के धनी व्यापारी लल्लूजी अग्रवाल ने बाबू सागरमल के सहयोग से करवाया। इस घाट का नाम एक विशाल गूलर के पेड़ के नाम पर पड़ा, जो यहां की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत का प्रतीक है। यह घाट आज भी वाराणसी की परंपरा और इतिहास को जीवंत बनाए हुए है।

घाट की विशेषताएं

Gulariya Ghat - गुलरिया घाट
Gulariya Ghat – गुलरिया घाट

गुलरिया घाट, भले ही ऐतिहासिक दृष्टि से कम महत्व रखता हो, लेकिन इसकी अनूठी विशेषताएं इसे खास बनाती हैं। एक समय में यह घाट मुख्य रूप से स्थानीय लोगों द्वारा मवेशियों को नहलाने के लिए उपयोग किया जाता था। घाट के ऊपरी भाग में स्थित एक प्राचीन मंदिर और पारंपरिक कुश्ती का स्थल इसे सांस्कृतिक महत्व प्रदान करता है। इसके अलावा, यहां द्वारका के शारदापीठ की एक शाखा भी स्थित है, जहां दंडी तपस्वी निवास करते हैं। ये तपस्वी गेरुआ वस्त्र धारण करते हैं और हाथों में लाठी लेकर अपनी साधना में लीन रहते हैं। यह घाट साधना और परंपरा का अनूठा संगम है।

स्वामित्व और जीर्णोद्धार

1958 में उत्तर प्रदेश सरकार ने गुलरिया घाट का जीर्णोद्धार और संरक्षण कर इसे नई पहचान दी। इस घाट के किनारे स्थित विशिष्ट संपत्तियों का स्वामित्व संबंधित मंदिरों, ट्रस्टों, और स्थानीय निवासियों के पास है, जो इसकी ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता को बनाए रखते हैं। वहीं, घाट क्षेत्र का स्वामित्व नगर निगम के पास है, जो इसके रखरखाव और संरक्षण का जिम्मा संभालता है। यह प्रबंधन व्यवस्था घाट की सांस्कृतिक और सामाजिक धरोहर को संरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

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