मणिकर्णिका घाट, वाराणसी

लेख - Yogi Deep

Last Updated on March 12, 2026 by Yogi Deep

मणिकर्णिका घाट, काशी के पाँच प्रमुख और प्राचीनतम तीर्थों एवं घाटों में इसका विशेष स्थान है। घाट पर स्थित मणिकर्णिका कुण्ड और उससे जुड़ी पौराणिक कथा के कारण ही इस घाट का नाम मणिकर्णिका पड़ा। यह घाट न केवल स्नान और तीर्थ के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि विश्व प्रसिद्ध महाश्मशान के रूप में भी जाना जाता है। वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर दूर-दूर से लोग अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार करने आते हैं और प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु गंगा स्नान करते हैं। मणिकर्णिका घाट का इतिहास, धार्मिक महत्व और सनातन मान्यताएँ काशी की प्राचीन परंपरा को आज भी जीवंत रखे हुए हैं।

घाट का नाममणिकर्णिका घाट/ चक्रपुष्करणी घाट
क्षेत्रवाराणसी (काशी)
निर्माणप्राचीन काल (सातवीं शताब्दी से उल्लेख, मत्स्यपुराण एवं काशीखण्ड में)
निर्मातापौराणिक: भगवान विष्णु (चक्र से कुण्ड खोदा)
ऐतिहासिक मुख्य निर्माण: पेशवा बाजीराव प्रथम (1730 ई.)
विशेषताकाशी के पाँच प्रमुख प्राचीन तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ, महाश्मशान, मणिकर्णिका कुण्ड, विष्णु चरणपादुका, पंचक्रोशी एवं पंचतीर्थी यात्रा का प्रारंभ एवं समापन बिंदु, तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र
वर्तमान स्थितिसक्रिय तीर्थ एवं महाश्मशान
उत्तरी भाग: स्नान एवं स्वच्छ पक्का घाट
दक्षिणी भाग: शवदाह क्षेत्र
2026 तक बड़ा पुनर्विकास कार्य चल रहा है (18 नई चिता प्लेटफॉर्म, लकड़ी भंडारण, मुंडन क्षेत्र, शौचालय, वेटिंग एरिया, मंदिर संरक्षण)
परियोजना: काशी विश्वनाथ कॉरिडोर से जुड़ी, पर्यावरण-अनुकूल आधुनिकीकरण

मणिकर्णिका घाट का नामकरण और पौराणिक कथा

प्रारम्भ में यह घाट प्रमुख विष्णु तीर्थों में एक था और घाट स्थित मणिकर्णिकाकुण्ड चक्रपुष्करणी के नाम से जाना जाता था। काशीखण्ड में भी इसका नाम चक्रपुष्करणी ही मिलता है। पारम्परिक मान्यताओं के अनुसार जब भगवन शिव और माता पार्वती कुण्ड का अवलोकन कर रहे थे, उसी समय माता पार्वती के कान का मणि चक्रपुष्करणी में गिर गया। माता पार्वती का कर्णमणि गिरने के कारण ही इस कुण्ड और घाट का नाम मणिकर्णिका पड़ा। आज भी इस पवित्र कुण्ड में स्नान करने का विशेष माहात्म्य माना जाता है।

मणिकर्णिका घाट का प्राचीन इतिहास और विस्तार

तीर्थ के रूप में इस घाट का प्रारम्भिक उल्लेख मत्स्यपुराण में मिलता है, जहाँ गंगातट पर स्थित पाँचों तीर्थों में इसे सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। इस तीर्थ एवं घाट का विस्तृत उल्लेख काशीखण्ड तथा जैन ग्रन्थ विविधतीर्थकल्प में भी उपलब्ध है। प्रारम्भ में इस घाट का विस्तार वर्तमान से बहुत अधिक था। काशीखण्ड के अनुसार उत्तर में इसका विस्तार हरिश्चन्द्र मण्डप (संकठा घाट) तथा दक्षिण में गंगाकेशव (ललिता घाट) तक था।

19वीं शती ई. तक यह घाट संकठा, सिन्धिया, दत्तात्रेय, सिद्धिविनायक, मणिकर्णिका एवं जलशायी घाटों के रूप में विभक्त हो गया। वर्तमान में मणिकर्णिका घाट का विस्तार दक्षिण में जलशायी घाट तथा उत्तर में सिन्धिया घाट के मध्य है। 19वीं शती ई. के दत्तात्रेय एवं सिद्धिविनायक घाट इसी में समाहित हो गये।

ज्ञातव्य है कि सन 1730 ई. में मराठाओं द्वारा इस घाट को पक्का बनाया गया था। मणिकर्णिका घाट काशी का बहुत प्राचीन तीर्थ है और इसका उल्लेख सातवीं शताब्दी में भी मिलता है।1

मणिकर्णिका घाट का धार्मिक महत्व, तीर्थ एवं मंदिर

मणिकर्णिका घाट के धार्मिक महत्व का विवेचन अनेक पुराणों एवं ग्रन्थों में मिलता है। मत्स्यपुराण के अनुसार यहाँ प्राण त्यागने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। काशीखण्ड में यहाँ जन्म और मरण दोनों को मंगलकारी कहा गया है। विनयपत्रिका में इसे काशी के समस्त तीर्थों में श्रेष्ठतम माना गया है। 1302 ई. में वीरेश्वर नामक व्यक्ति द्वारा घाट पर मणिकर्णिकेश्वर मंदिर के निर्माण से भी घाट के धार्मिक महत्व का पता चलता है।

घाट के प्रमुख तीर्थ

मणिकर्णिका घाट और इसके आसपास गंगा में अनेक पवित्र तीर्थों की मान्यता है। इनमें प्रमुख हैं:

  • मणिकर्णिका तीर्थ
  • अविमुक्तेश्वर तीर्थ
  • इन्द्रेश्वर तीर्थ
  • चक्रपुष्करणी
  • उमा तीर्थ
  • तारक तीर्थ
  • पितामह तीर्थ
  • विष्णु तीर्थ
  • स्कन्द तीर्थ

घाट के प्रमुख मंदिर

Ratneshwar Mahadev Mandir, Varanasi
Ratneshwar Mahadev Mandir, Varanasi

मणिकर्णिका घाट पर अनेक प्राचीन मंदिर स्थित हैं, जिनमें अधिकांश भगवान शिव को समर्पित हैं। प्रमुख मंदिर हैं:

  • तारकेश्वर मंदिर
  • मणिकर्णिकेश्वर मंदिर
  • रत्नेश्वर मंदिर
  • आमेठी शिव मंदिर
  • रानी भवानी मंदिर

इसके अतिरिक्त यहाँ स्थित अन्य महत्वपूर्ण मंदिर हैं:

  • सिद्धिविनायक मंदिर
  • मणिकर्णी विनायक मंदिर
  • मणिकर्णी देवी मंदिर

इसके अलावा यहाँ कई छोटी-छोटी देवकुलिकाएँ भी स्थित हैं।

तीर्थयात्राओं में मणिकर्णिका घाट की भूमिका

काशी की पंचक्रोशी यात्रा करने वाले तीर्थयात्री यहीं स्नान, दान, पूजन एवं संकल्प लेकर अपनी यात्रा प्रारम्भ करते हैं तथा अन्त में यहीं आकर स्नान-दान करने के पश्चात् यात्रा समाप्त करते हैं। काशी की पंचतीर्थी एवं विश्वेश्वर की अन्तर्गृही यात्रा करने वाले यात्री भी यहीं स्नान-दान तथा संकल्प के बाद अपनी यात्रा शुरू करते हैं। इस प्रकार मणिकर्णिका घाट काशी की समस्त प्रमुख तीर्थयात्राओं का प्रारम्भिक और समापन बिन्दु बना हुआ है।

मणिकर्णिका घाट: तीर्थ से महाश्मशान तक की यात्रा

वर्तमान में काशी का यह घाट तीर्थ एवं श्मशान दोनों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ प्राण त्यागने एवं शवदाह के लिए दूर-दूर से लोग अपने प्रियजनों के शव लेकर आते हैं। ज्ञातव्य है कि प्रारम्भ में यह घाट केवल तीर्थ के रूप में जाना जाता था और यहाँ आदि श्मशान नहीं था। काशीखण्ड के अनुसार काशी का प्राचीन श्मशानघाट वर्तमान संकठा घाट से लेकर स्वर्गद्वार (स्वर्गद्वारी मुहल्ला) तक फैला हुआ था। संकठा घाट स्थित यम धर्मेश्वर एवं हरिश्चन्द्रेश्वर मंदिर तथा यम द्वितीया को लगने वाला स्नान मेला भी इसी का प्रमाण है।

ऐसा माना जाता है कि मणिकर्णिका घाट पर शवदाह की परम्परा 18वीं शती ई. में प्रारम्भ हुई। इसके पूर्व हरिश्चन्द्रघाट और उससे पहले संकठाघाट पर शवदाह होता था। सवाई मानसिंह द्वितीय संग्रहालय जयपुर से प्राप्त काशी के घाटों के रेखाचित्र में भी श्मशान के रूप में हरिश्चन्द्रघाट को ही दिखाया गया है।

मणिकर्णिकाघाट पर श्मशान भूमि की स्थापना कश्मीरी मल (18वीं शती ई. के पूर्वार्द्ध) ने की। कहा जाता है कि कश्मीरी मल अपनी माता का शव लेकर हरिश्चन्द्र घाट पहुँचे, जहाँ डोम समुदाय से कुछ विवाद हो गया। तब उन्होंने अपनी माता का शव हरिश्चन्द्र घाट से उठवा कर यहाँ लाया, पण्डों और जमींदारों से जगह खरीदी और दाह किया।

कुछ उल्लेखों के अनुसार श्मशान भूमि की योजना नारायण दीक्षित ने तैयार की थी। नारायण दीक्षित का काशी के महाजनों से अच्छा सम्बन्ध था और उनकी प्रेरणा से ही कश्मीरी मल ने घाट के दक्षिणी भाग में यह व्यवस्था की। श्मशान घाट और डोमों के निर्धारित दाम कायम करने का श्रेय भी नारायण भट्ट कायगाँवकर के वंशज नारायण भट्ट को दिया जाता है।

विष्णु चरणपादुका और विशेष परंपराएँ

वर्तमान मणिकर्णिकाघाट के उत्तरी भाग में एक वर्गाकार चबूतरे के मध्य विष्णुचरण चिन्ह अंकित है जिसे विष्णु चरणपादुका कहा जाता है। कुछ वर्ष पहले तक जिलाधिकारी की अनुमति से केवल विशिष्ट व्यक्तियों का शवदाह इस चबूतरे पर किया जाता था, जो वर्तमान में पूरी तरह प्रतिबन्धित है।

वर्तमान स्वरूप, धार्मिक गतिविधियाँ और संरक्षण

घाट का उत्तरी भाग पक्का, स्वच्छ एवं सुदृढ़ है। इसका मरम्मत एवं कुछ भागों का पुनर्निर्माण उत्तर प्रदेश सरकार के सहयोग से सिंचाई विभाग ने 1988 ई. में कराया था। वर्तमान में घाट के दक्षिणी भाग में शवदाह होता है तथा उत्तरी भाग में लोग स्नान करते हैं।

घाट की सीढ़ियों पर अनेक छोटी-छोटी मढ़ियाँ बनी हुई हैं। इनमें कुछ तो घाट की मजबूती के लिए बनाई गई हैं, कुछ घाटियों और गंगापुत्रों के कब्जे में हैं, जबकि कुछ मढ़ियाँ यात्रियों ने ब्राह्मणों और साधु-संतों के ठहरने के लिए बनवाई थीं। आज इनकी चौस्स छतों पर घाटिये बैठकर अपनी दिनचर्या चलाते दिखाई देते हैं।

यहाँ सदैव दैनिक स्नानार्थियों की भीड़ रहती है, किन्तु कार्तिक माह में स्नान का विशेष माहात्म्य होने से सर्वाधिक भीड़ उमड़ती है। सूर्य-चन्द्र ग्रहण, प्रबोधनी एवं निर्जला एकादशी, मकर एवं मेष संक्रांति, गंगा दशहरा, तीज, कजरी, छठ, भैयादूज आदि पर्वों पर स्नान का विशेष महत्व है। शवदाह के अतिरिक्त पिण्डदान, तर्पण, मुण्डन, विवाह, गंगा पुजैया तथा अन्य मनौती की धार्मिक क्रियाएँ भी यहाँ सम्पन्न होती हैं। कार्तिक माह में घाट पर श्रीरामलीला का आयोजन भी होता है।

मणिकर्णिकाघाट की श्मशान भूमि तंत्र साधकों के लिए विशेष महत्वपूर्ण मानी जाती है। यद्यपि तांत्रिकों को सदैव यहाँ देखा जा सकता है, किन्तु कार्तिक माह की अमावस्या की रात्रि, तंत्र साधना के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होता है। इस समय नेपाल, भूटान तथा तिब्बत आदि देशों के तांत्रिक भी यहाँ साधना करते दिखाई देते हैं।

घाट के अन्य रोचक तथ्य

19वीं शती के प्रथम चरण में जेम्स प्रिंसेप की गहन जाँच-पड़ताल से पता चला कि 18वीं शती में मणिकर्णिका घाट के आसपास जंगल रहा होगा। बड़े-बड़े वृक्ष 19वीं शती तक घाट के आसपास दिखाई देते थे, जो बाद में आधुनिकीकरण में लुप्त हो गये।

18वीं शती के अन्त और 19वीं शती के आरम्भ में मणिकर्णिका घाट की जमीन का दाम बहुत ऊँचा था। 1829 ई. में महाराज सिंधिया ने मणिकर्णिका के बगल में वीरेश्वर घाट की मरम्मत के लिए 15,000 रुपये देकर गंगापुत्रों की अनुमति माँगी, किन्तु वे चबूतरे रखने की अनुमति न दे सके।2

निष्कर्ष मणिकर्णिका घाट काशी की सनातन आस्था का जीवंत प्रतीक है। यहाँ तीर्थ और महाश्मशान दोनों एक साथ विराजमान हैं। जो भी एक बार इस पावन घाट पर आता है, वह काशी की शाश्वत शक्ति को अनुभव करता है। जय काशी विश्वनाथ!

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संदर्भ

  1. काशी का इतिहास – डॉ० मोतीचंद – पेज – 393 ↩︎
  2. काशी का इतिहास (पेज 393) ↩︎
आदि काशी - Aadi Kashi

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