Last Updated on May 11, 2026 by Yogi Deep
वाराणसी (काशी) के घाट अपनी पौराणिकता और अद्भुत वास्तुकला के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। इन्हीं में से मणिकर्णिका घाट के ठीक समीप स्थित एक प्रमुख और आकर्षक घाट है सिन्धिया घाट। अपनी ऐतिहासिक विरासत और “झुके हुए मंदिर” के लिए मशहूर यह घाट न केवल पर्यटकों के लिए बल्कि श्रद्धालुओं और साधु-संतों के लिए भी गहरी आस्था का केंद्र है।
प्राचीन इतिहास: वीरेश्वर घाट से सिन्धिया घाट तक का सफर
सिन्धिया घाट का सबसे पुराना नाम वीरेश्वर घाट था। इसका उल्लेख 17वीं शताब्दी के ग्रंथ ‘गीर्वाणपदमंजरी’ में भी मिलता है। इस घाट का नाम यहाँ स्थित वीरेश्वर (शिव) मंदिर के कारण पड़ा था।

- मंदिर का निर्माण: वीरेश्वर या आत्मवीरेश्वर मंदिर का निर्माण 1302 ईस्वी में वीरेश्वर नामक व्यक्ति ने कराया था।
- पौराणिक संदर्भ: वीरेश्वर का वर्णन प्राचीन ग्रंथों जैसे ‘काशीखण्ड’ में भी मिलता है, जो इसकी ऐतिहासिक महत्ता को दर्शाता है।
ग्वालियर राजपरिवार का योगदान और निर्माण
1835 ईस्वी में ग्वालियर के महाराजा दौलतराव सिन्धिया की पत्नी बैजाबाई सिन्धिया ने इस घाट का पक्का निर्माण कराया। इसी समय से इसे ‘सिन्धिया घाट’ के नाम से पहचाना जाने लगा। हालांकि, निर्माण के कुछ वर्षों बाद ही घाट का एक हिस्सा नींव ठीक न होने के कारण यह घाट पीछे की तरफ झुक गया और टूट गया था।1 जिसके कारण यह काफी समय तक उपेक्षित रहा। 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में सिन्धिया राजपरिवार ने इसका पुनरुद्धार (Renovation) कराया, जिससे इसे वर्तमान भव्य स्वरूप मिला।
रत्नेश्वर महादेव: स्थापत्य का अद्भुत चमत्कार
सिन्धिया घाट की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ स्थित रत्नेश्वर महादेव मंदिर है। यह मंदिर अपनी अनूठी स्थिति के कारण दुनिया भर में चर्चा का विषय रहता है:

- 9 डिग्री का झुकाव: यह मंदिर अपने अक्ष से लगभग 9 अंश (degree) झुका हुआ है, जो इसे स्थापत्य कला का एक अनोखा उदाहरण बनाता है।
- गंगा में समाहित: इस मंदिर की एक और खास बात यह है कि यह साल के लगभग 6 महीने गंगा के पानी में डूबा रहता है और शेष समय ही दर्शन के लिए उपलब्ध होता है।
- लोक कथाएं: मंदिर के इस प्रकार झुके होने के पीछे वाराणसी में कई रोचक लोक कथाएं और किंवदंतियां प्रचलित हैं।
आध्यात्मिक महत्व और प्रमुख मंदिर
सिन्धिया घाट और इसके आसपास का क्षेत्र मंदिरों का समूह है। यहाँ मुख्य रूप से 6 मंदिर अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
- शैव मंदिर: वीरेश्वर, पर्वतेश्वर, वामदेवेश्वर, रत्नेश्वर और वशिष्ठेश्वर।
- वैष्णव मंदिर: वैकुण्ठ माधव।
- दत्तात्रेय मंदिर: भगवान दत्तात्रेय को समर्पित।
धार्मिक दृष्टि से घाट के ठीक सामने गंगा में हरिश्चन्द्र तीर्थ की स्थिति मानी जाती है, जो इसे और भी पवित्र बनाता है।
सांस्कृतिक विविधता और वर्तमान स्वरूप
आज सिन्धिया घाट वाराणसी के सबसे स्वच्छ, सुदृढ़ और रमणीय घाटों में से एक है। यहाँ की शांति और सुंदरता अद्भुत है। इस घाट की एक विशिष्ट पहचान यहाँ रहने वाले विभिन्न पंथों के साधु-संन्यासी हैं। यहाँ आपको निम्नलिखित संप्रदायों की झलक देखने को मिलती है:
- शैव और वैष्णव साधु
- कबीर पंथी
- नानक पंथी
- दादू पंथी
सिन्धिया घाट केवल पत्थर की सीढ़ियाँ नहीं, बल्कि काशी की सदियों पुरानी संस्कृति और इतिहास का गवाह है। चाहे वह 9 डिग्री झुका हुआ रत्नेश्वर मंदिर हो या यहाँ की आध्यात्मिक शांति, सिन्धिया घाट वाराणसी की यात्रा को पूर्ण बनाता है।
सन्दर्भ
- Banaras by Babu Balmukund Varma 1924 ↩︎
