Last Updated on March 3, 2026 by Yogi Deep
जलासेन घाट वाराणसी, जिसे जलशायी अथवा जलसेन घाट भी कहा जाता है। इस घाट का प्राचीन नाम मोक्षद्वारेश्वर घाट है। यहाँ काशी का प्राचीन श्मशान घाट है जहाँ शिव की शरण में आत्मा को मोक्ष मिलता है। वाराणसी के घाट अपनी धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक महत्व और आध्यात्मिक परंपराओं के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। जलशायी घाट, गंगा तट पर स्थित है और विशेष रूप से मोक्ष, शिव उपासना और अंतिम संस्कार की परंपराओं से जुड़ा हुआ है।
| घाट का नाम | जलशायी घाट /जलासेन घाट |
| क्षेत्र | वाराणसी |
| निर्माण | 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध |
| निर्माता | राजा बलदेवदास बिड़ला |
| विशेषता | गंगा जी में शिव जल लिंग के रूप में स्थित |
| दर्शनीय स्थल | मणिकर्णिका |
नामकरण और धार्मिक मान्यताएँ
जलशायी घाट के नाम के पीछे एक प्राचीन धार्मिक मान्यता है। ऐसा माना जाता है कि गंगा नदी के भीतर भगवान शिव स्वयं जल लिंग के रूप में शयन करते हैं, इसलिए इसे जलशायी या जलासेन घाट कहा जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार, मृत व्यक्ति के रुद्रांश को जलशायी शिवलिंग को अर्पित करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इतिहासकारों के अनुसार, इस घाट का प्राचीन नाम “मोक्षद्वारेश्वर घाट” था, जिसका उल्लेख गीर्वाणपदमंजरी जैसे ग्रंथों में भी मिलता है। प्राचीन मोक्षद्वारेश्वर घाट ही कालान्तर में जलशायी घाट में परिवर्तित हो गया। प्रिन्सेप द्वारा इसे पहली बार “जलशायी घाट” के नाम से वर्णित किया गया था।
स्थापत्य और वर्तमान स्वरूप

जलशायी घाट का पक्का निर्माण 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में राजा बलदेवदास बिड़ला द्वारा करवाया गया था। घाट के उत्तरी भाग में एक धर्मशाला भी बनाई गई, जहाँ शवदाह के लिए आए तीर्थयात्री या मोक्ष की इच्छा रखने वाले लोग निवास करते हैं।
- वर्तमान समय में यह घाट बाबा विश्वनाथ द्वार के रूपमें विकसित कर दिया गया है।
- घाट का उत्तरी भाग सीधे मणिकर्णिका घाट (श्मशान घाट) से जुड़ा है, इसलिए यहाँ भी शवदाह की प्रक्रिया होती है।
- घाट पर स्नान या धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन नहीं होता, क्योंकि यह शुद्ध रूप से एक शवदाह स्थल है।
- पूर्व में दक्षिणी भाग में नाविक अपनी नावें बाँधते थे, वहीं उत्तरी भाग में मिट्टी-बालू का ढेर था, जहाँ शवदाह के अतिरिक्त शवदाह के लिए नाव से लायी गयी लकड़ियाँ उतारी जाती थीं।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण: काशी का बदलता भूगोल
ब्रिटिश यात्री हॉजेज ने इस घाट का वर्णन करते हुए इसे गेलसी गाट कहा था। उन्होंने यहाँ एक विशाल पुश्ते, उसके ऊपर बने बाग, एक बुर्जी और दो मंडपों का विवरण दिया है, जो उस समय की स्थापत्य और परिवेश को दर्शाता है।1
बनारस में यहाँ मुर्दे जलने की प्रथा कब से चली आ रही है इसका तो पता नहीं चलता, पर हिन्दू नगरो के दक्षिण में शमशान होने से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जब बनारस की बस्ती उत्तर में थी तब शायद श्मशान यहाँ था, पर शहर की बस्ती तो बनारस के दक्षिण में बढती गयी पर श्मशान जहाँ का तहाँ रहा। फिर भी यह विवादास्पद है कि यह प्राचीन श्मशान सभी कालो में एक ही जगह पर था, अथवा वह अपना स्थान बदलता रहा है।2
तीर्थयात्रियों और स्थानीयों के लिए महत्त्व
वाराणसी आने वाले मोक्ष पिपासु तीर्थयात्री जलशायी घाट पर आकर अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी करते हैं। यहाँ की धर्मशाला, शांत वातावरण और मणिकर्णिका से निकटता इस घाट को विशेष बनाते हैं। धार्मिक दृष्टिकोण से यह स्थान आत्मा की शांति और मोक्ष प्राप्ति के लिए उपयुक्त माना जाता है।
जलशायी घाट काशी की आध्यात्मिक परंपरा का प्रतीक है। इसकि गलियों में प्राचीन कहानियां व्याप्त हैं। यदि आप वाराणसी की धार्मिक और ऐतिहासिक परंपरा को समझना चाहते हैं, तो जलशायी घाट का सफ़र अवश्य करें – यह आत्मा की मुक्ति का मार्ग है।
